उस दिन
कई शक्लें दिखी
कुछ उदास ऑखे
और कुछ मैंन होंठ
हालांकि कुछ ने कोशिश
की
सिलें होंठों को खोलने की
लेकिन.........
वो स्नेह और करूणा को अलावा कुछ न दें सके।
उस समय
मेरे पॉव चाहतें थें.....की जम जाए
या फिर सें दौैंडे़ मॉनिग पी०टी० मे
या भागें .....असेंबली मे लेट होते हुए
फिर सें कूदे दिवार
मेरे हाथ अब भी चाहत मे थें
संडे को मिलकर कपडें धोनें की
और निगाहें रख लेना चाहती थीं
सहेज कर
बिल्डिगे,पानी की टंकी,
और सबसे यादगार..... हाउस का स्टोर
और मेै इन सब कों
यादों की पोटली मे सहेजता हुआ,
घर छोड़कर मंजिल की तरफ बढ रहा था।
🇮🇳CHANDAN KUMAR MISHRA🇮🇳
1 Comments
Superrr
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