धरती प्यासी अम्बर प्यासा,
जल विहीन यह सागर प्यासा।
सीप के अंदर मोती प्यासा,
जिसमें एक समंदर प्यासा।
सैनिक की विधवा रोती है,
उजड़ी माँग महावर प्यासा।
राज्य -हड़पने की नीति में,
आया भारत सिकँदर प्यासा।
चली आँधियां देखो यारो,
उजड़ी बस्ती बवँडर प्यासा।
घर में चोरी करने खातिर,
अपने घर का नौकर प्यासा।
यादें तेरी हैं बहुत सताती,
वस्ल की रात,बिस्तर प्यासा।
धंधा- पानी कम चलता है,
कैसा अपना मुक़द्दर प्यासा।
देखो तुम दफ्तर में जाकर,
रिश्वत खातिर अफ़सर प्यासा।
घर की हालत क्या हुई,
बिना मरम्मत छप्पर प्यासा।
🇮🇳CHANDAN KUMAR MISHRA🇮🇳
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