[ #BEST] POEM: ठीक नही

बात-बात में प्रदर्शन धरना ठीक नहीं ,
लोगों का यूँ हद से गुजरना ठीक नहीं।

प्रजातंत्र के नाम  अपने अधिकारों का,
ऐसे ही दुरुपयोग सा करना  ठीक नहीं।

अपमानित क्यों तुम करते हो मुझको, 
जीते जी ये रोज़ का मरना ठीक नहीं।

ये शामत कैसी  आई  है महामारी की ,
यूँ  चौराहों पर  रोज़ ठहरना ठीक नहीं।

उस दिन कह गए थे मुझसे मै आऊंगा, 
यूँ वादों से इस तरह मुकरना ठीक नहीं।

सीप समन्दर मोती मिले तो अच्छा है, 
नैनों से मोती का बिखरना ठीक नहीं।

सावन भादों बिन बरसे  रह जाएँ भले, 
आँखों  से सावन का झरना ठीक नहीं।

यूँ मेरी  तुम्हें  नज़र कहीं  न लग जाए 
रोज़-रोज़ सज धज सँवरना ठीक नहीं।

कहीं बाघ न आ जाये इस वन में महेंद्र "
हिरणी का बेखौफ़ सा चरना ठीक नहीं।

🇮🇳CHANDAN KUMAR MISHRA🇮🇳

2 Comments