ख़रीफ़ की फ़सलें सूख रहीं हैं न इठलाओ सावन जी,
उमड़-घुमड़ नभ में छा जाओ,ध्रुपद गाओ सावन जी।
कोयल मोर पपीहरा प्यासे,सरिता दरिया भी हैं प्यासे,
राग मल्हार भी सूना लागे, प्यास बुझाओ सावन जी।
धरती फिर श्रृंगार को तरसे, धानी चुनर ओढ़ने तरसे,
सूनी मांग लिए फिरती है, मांग सजाओ सावन जी।
बगिया है फूलों बिन सूनी, चम्पा कहीं चमेली सूनी,
बेला की खुशबू से सारा चमन महकाओ सावन जी।
धार चले नदिया की भारी,नाव नहीं चल पाये नदी में,
सजनी मायके जाने तरसे जल छलकाओ सावन जी।
जल से भरें ये ताल तलैयाँ, पानी भरे खेत खलिहानों,
ऊँचे पर्वत झरना झरते ऐसे रूप दिखाओ सावन जी।
गाँव की गोरी राम दुलारी,झूले रही अमुआ की डारी,
शीतल मंद सुगंध सी फिर पवन चलाओ सावन जी।
मदहोशी सावन में छाई, जल की बूँदें अगन लगाई
सावन में मदिरा छलके न बहकाओ सावन जी।
🇮🇳CHANDAN KUMAR MISHRA🇮🇳
2 Comments
Woww,,,nice poem.
ReplyDeleteBest of luck bhaiya
Awesome..👌🏻👌🏻
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