कर्म करने के पाँच कारण

*💐🌹हमें जानना जरूरी है कि यदि ईश्वर या आत्मा स्वयं कर्म नहीं करता, तो फिर कर्म कौन करता है? अगर गीता को पढें तो अध्याय चौदह व अट्ठारह में इसका उल्लेख किया गया है, कि कर्म करने के पॉच कारण हैं, जिनमें आत्मा स्वयं कर्म नहीं करता है।🌹💐*

पहला कारण शरीर है जो कर्म करता है, दूसरा कारण कर्मेंन्द्रियॉ हैं, जिनकी सहायता से शरीर कर्म करता है, तीसरा कारण जीवात्मा है, वही कर्ता है, चौथा प्रॉण वायु है जो क्रिया का करण है, और पॉचवॉ देव है जो इन सबका अधिष्ठाता है, ये सारे आत्मा के प्रकाश से कार्य करते हैं, स्वयं आत्मा कोई कार्य नहीं करता है।

प्रकृति के सत्व, रज तथा तमोगुण ही उसे कर्म करने के लिए वाध्य करते हैं, वह उनके अधीन रहकर ही कर्म करता है, वह स्वतंत्र नहीं है, अच्छे कर्मों से बुरे कर्मों को काटा नहीं जा सकता है, दोनों कर्मों का फल भोगना होता है, अगर चोरी कर दी, तो दान करने से चोरी के अपराध से बचा नहीं जा सकता है, जब तक अच्छाई नहीं लाई जाएगी तबतक बुराई को हटाया नहीं जा सकता है, दीपक जलाने से ही अन्धकार मिटेगा, उसे सीधा हटाया नहीं जा सकता है ।

सृष्टि के कण-कण में व्याप्त जो चेतन सत्ता है वही ईश्वर का निवास स्थान है, उस ईश्वरीय विधान से बचने का कोई उपाय नहीं है, कर्मफल तो भोगना ही पडता है, शास्त्रों के अनुसार कर्म करते रहना ही इनसे मुक्ति का एक मात्र उपाय है, मनुष्य के सत्व, रज व तम गुंण के यही तो लक्षण हैं-  सत्व गुंणसे ज्ञान होता है, रजोगुण से क्रिया होती है, तथा तमोगुँण से मूढता, अज्ञान, जडता, आलस्य, प्रमाद होता है।

सदाचार और सद्कर्म अपने शास्त्रों के अनुसार, अपने धर्म ग्रन्थों में जो विधि निषेध के नियम बताये गये हैं उन्के अनुसार आचरण और व्यवहार करना उत्तम है, जो धर्म तत्व की बात नहीं जानता और शास्त्रों का भी अध्ययन नहीं किया उसे किस प्रकार का जीवन जीना चाहिये? अपने द्वारा किसी को कष्ट न देना, तथा सदा दूसरे के भले के लिये ही कर्म करना यही तो जीवन का सद्मार्ग है, और यही परम धर्म भी है।

केवल दूसरों को कष्ट न दें,क्या यह प्रयाप्त नहीं है? इससे पाप से तो बच जायेंगे किन्तु पुण्य का लाभ नहीं मिल सकता, दूसरों का भला करने की भावना से बुराई से अपने आप बच सकते हैं, क्योंकि यदि कोई भूख या बीमारी आदि से तडफ रहा हो तो यह कह देना कि हमने थोडे ही किया है, यह तो अपने कर्मों का फल भोग रहा है, ऐसा कहकर उसकी सहायता न करना मानवीय दृष्टि नहीं है, क्योंकि कुछ सम्प्रदाय ऐसी ही गलत मान्यतायें रखते हैं।

अहिंसा पालन का फल होता है एक भाव, जो मुझे कोई गलत काम न करवा दें अपने जीवन में खुद हिंसा नहीं करने और दूसरे को इसकी जानकारी देने से लोगों को एक अध्यात्म स्वार्थ आनी चाहिये, उसे अपनी ही चिंता अधिक रहती है कि मेरे से पाप कर्म न हो, लेकिन अहिंसा से  दूसरों का भला भी  करना चाहिये, जो आत्मज्ञान की साधना नहीं कर सकता उसे इसी प्रकार का जीवन जीना चाहिये? उसे तो सदाचार और सेवा धर्म को अपनाना चाहिये। 

भारत में मोक्ष और मुक्ति प्राप्ति को ही जीवन का अन्तिम लक्ष्य माना जाता है ऐसा क्यों? क्योंकि मोक्ष प्राप्ति तो इस जीव चेतना की अन्तिम स्थिति है, जहॉ से आरम्भ हुआ है वहीं पहुंच जाना है, यदि कोई गृहस्थ में रहकर भी कामना, वासना, आसक्ति, मोह, ममता मोह का त्याग कर सकता है तो विधिवत् सन्यास की कोई आवश्यकता नहीं है, वह सन्यास ही है, लेकिन ऐसा सन्यास सामान्यतः सम्भव नहीं है, काजल की कोठरी में रहने पर कालिख
से कोई बच नहीं सकता ।

सन्यास का अर्थ यह नहीं है कि अपना घर-बार छोडकर जंगल चले जाना, और भगवा वस्त्र पहनना, यह सन्यास नहीं है, बल्कि सॉसारिक भोगों के प्रति आसक्ति का त्याग एवं फल की इच्छा का त्याग ही सन्यास है, गुरु चरणों की सेवा से ही, सत् गुरु  की महिमा से ही इस मुकाम तक पहुंच सकते हैं क्योंकि गुरुदेव और गुरु की महिमा अपरम्पार है, जो अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश देता है, वही गुरु है।

गुरु ही वास्तविकता का ज्ञान कराता है, और गुरु ही शिष्य को ईश्वर तत्व प्रदान करता है, इसलिये गुरुदेव को ईश्वर से भी ऊंचा स्थान दिया गया है, गुरु और शिक्षक में यही तो अन्तर है, शिक्षक मात्र ज्ञान दाता है, लेकिन गुरु तो शिष्य को पूर्ण रूपान्तरण कर देता है, उसे नया ही रूप दे देता है, वह तो मुक्ति दाता है, गुरु को कौई भी कभी किसी परिभाषा में नहीं बांध सकता, जो स्वयं ब्रह्मज्ञानी है, वही सच्चा गुरु है।

ज्ञान तो चेतनाशक्ति आत्मा का गुंण है, जड पदार्थों में ज्ञान नहीं होता, आत्मा तो सबमें है फिर अज्ञान किससे होता है? अहंकार के कारण उस चेतन आत्मा के ज्ञान के अभाव में प्रकृति को ही ज्ञान का स्वरूप मान लेना यही अज्ञान है, आत्मा और शरीर तो सबके एक से हैं फिर सभी के व्यक्तित्व भिन्न-भिन्न क्यों होते हैं? 

क्योंकि, यह त्रिगुणॉत्मक प्रकृति पूर्व जन्मों के संस्कार तथा वातावरण मिलकर उसके व्यक्तित्व में भिन्नता पैदा करते हैं, इस त्रिगुणॉत्मक प्रकृति से मनुष्य का स्वभाव बनता है, आध्यात्मा इस चेतन शक्ति का विज्ञान है, तथा धर्म उस चेतना की अनुभूति का साधन है, और धर्म के विना चेतना का अनुभव नहीं हो सकता है, अभी में आपको छोटी-छोटी जानकारी दे रहा हूं,  यही छोटी-छोटी बातें आध्यात्मिक उन्नति के लिये बहुत जरूरी है।

धर्म और सम्प्रदाय में बहुत बड़ा अन्तर है, धर्म तो एक महांसागर है, तथा सम्प्रदाय उसमें छोटे-छोटे द्वीप हैं, धर्म में विशालता है, सम्प्रदाय में संकीर्णता है, धर्म सार्वर्भौम है तो सम्प्रदाय क्षेत्रीय है, जो ईश्वर को नहीं मानता उसका क्या परिणाम होता है? यह आप सब जानते हैं, ईश्वर का भय तो मानव को नैतिक बनाता है, अन्यथा उसकी नैतिकता दिखावा मात्र बनकर रह जाती है।

ईश्वर स्वयं किसी को सुख-दुख नहीं देता है, वह तो शक्ति का श्रोत है, उस शक्ति के सदुपयोग से मनुष्य सुखी होता है, तथा दुरुपयोग करने से वह दुखी होता है, यह तो मनुष्य के हाथ में है, संसार किसी को दुख-सुख नहीं देता, वह तो निरपेक्ष है, मनुष्य की विकृत मानसिकता उसमें दुःख ही देखती है, तथा स्वस्थ मानसिकता वाला इसमें आनन्द देखता है, दोनों की दृष्टि एकांगी है।

जब जीव चेतना आनन्दमय कोश में प्रवेश करती है तो उसे आनन्द की अनुभूति होती है, आनन्द की अनुभूति ही ईश्वरानुभूति है? यह सही नहीं हैं, यह आनन्दमय कोष तो ईश्वर के समीप का कोश है लेकिन यह शरीर का ही एक कोश है, ईश्वर के समीप होने से ही यहॉ आनन्द का अनुभव होता है।

सज्जनों, कर्मों की गति स्वर्ग तक ही है, यह मुक्ति का साधन नहीं है, मुक्ति का साधन तो निष्काम भाव से किया गया पावन कर्म हैं, इस शुद्ध आध्यात्म भाव और मूर्ति में ब्रह्म भावना रखकर पूजा की जाय तो उचित है, अन्यथा वह पाषाण पूजा ही है, मूर्ति तो केवल माध्यम (प्रतीक) है।

जय श्री कृष्ण!

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