इन अँधेरों में रास्ता दिखा कर देख लेता हूँ ,
आज फिर मैं दीपक जला कर देख लेता हूँ।
बीहड़ रास्ते हैं सुनसान से चलना है दूभर,
इन रास्तों से मैं कांटे हटा कर देख लेता हूँ।
तुम अभी आये हो सोचता हूँ दोस्ती करलें ,
तुम्हारे साथ भी कुछ दूर जा के देख लेता हूँ।
जख़्म दिए हैं मुझको मेरे ही अपनों ने बहुत ,
तुम नये हो तेरे साथ मुस्करा के देख लेता हूँ।
सैयाद बड़ा क़ातिल है ये आया है बाग में,
बाग से परिन्दो को उड़ा कर देख लेता हूँ।
तुम वही हो, हर बार मुझे नीचा दिखाते हो ,
चलो एक बार फिर आज़मा कर देख लेता हूँ।
मैं अकेला हूँ अकेले ही चला हूँ रास्तों पर,
अबके सफ़र में, क़ाफ़िला कर देख लेता हूँ।
भिखारियों को मैं अपने पुराने वस्त्र देता हूँ,
में गरीबों का भी भला कर देख लेता हूँ।
🇮🇳CHANDAN Kumar Mishra🇮🇳
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