[ BEST ] POEM : सावन

सावन में आसमान में, काली सी घटा हो,
इंद्रधनुषी रंगों की, मनभावन सी छटा हो !

अठखेलियां करती हुई, मदमस्त हवा हो,
पानी मौज बनकर उठ उठ के देखता हो !

टप टप टपकती बूंदें, शहनाइयां बजाती,
बादल घुमड़ घुमड़ के,मल्हार गा रहा हो !

सावन की  फुहारों में,  हम बाग घूमते हैं,
मेरे संग संग जैसे, ये  शज़र नहा रहा हो !

जलमग्न रास्ते हैं, नदिया  प्रलय मचातीं,
जैसे प्रकृति हमसे ,आज बेहद खफ़ा हो !

इन बादलों में देखो, चांद भी दिखता नहीं,
तेरी  तरह  जानम, वो  भी कहीं  छिपा हो !

सावन में बंधे झूले, गोरियां भी झूल रहीं,
मदमस्त पवन झोंका, आंचल उड़ा रहा हो !

रह रह के आज बचपन की यादें आ रही,
बारिशों का पानी हो कागज की नोका हो !

सावन की फुहार में  मयकशी का मजा है,
महेंद्र" ऐसा लग रहा है , जैसे  कि नशा हो !

🇮🇳CHANDAN KUMAR MISHRA🇮🇳

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