अभी तो मुझ में दमख़म है अभी तू नम न कर आँखें,
आँख तेरी क्यों पुरनम है अभी तू नम न कर आँखें।
दिन लद गए आतंकी जब रोज़ कत्ल हुआ करते थे,
अब काश्मीर में हमारे परचम है तू नम न कर आँखें।
अस्मतें लुट जातीं हैं यहाँ मासूम से नौनिहालों की,
देश का ऐसा ही आलम है अभी तू नम न कर आँखें।
यहाँ कौन है बेदाग कि जिसने कभी न किया हो पाप,
सारी दुनिया ही मुल्ज़म है अभी तू नम न कर आँखें।
हम तो जा रहे हैं परदेश न जाने लौटेंगे कब देश ,
बिछड़ते वक्त का ग़म है अभी तू नम न कर आँखें।
क्यों तुम दर्द पर अपने यूँ हमेशा मायूस रहते हो,
दर्द मेरा क्या तुमसे कम है अभी तू नम न कर आँखें।
कोई किसी का कभी ज़माने में होता नहीँ है ।
ऐसा यहाँ होता हरदम है अभी तू नम न कर आँखें।
🇮🇳CHANDAN KUMAR MISHRA🇮🇳
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